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ये मंज़िल नहीं, …

ये मंज़िल नहीं, एक पड़ाव भर है ,
मुझे अभी मीलों चलना बाकी है।
अरमानों में ख्वाहिशों के पंख लगे
अभी मुझे आसमां में उड़ना बाकी है।
मैंने देखे हैं जहाँ में चाँद सितारे अब तक
उनकी ओट में खो जाना अभी बाकी है।
मेरी राहें अलग हो जाएँ तुमसे बेशक
मगर फिर मिलनेको जीना अभी बाकी है…।

An excerpt from my upcoming poem in hindi

उनसे क्या फरियाद करें
जो पेट अपना भरने को
गरीबों का पेट काटते हैं
लूट कर भोली जनता को
यह भ्रष्ट अंधे अपनों में
ही रेवड़ियाँ बांटते हैं

Intezaar !

INTEZAAR

Badalon ka ghumad kar garazana

toofano ka yun  tabahi machana

par garmi se jhulasti dharti ko to

hai baarish ki boondo ka Intezaar!

Chirag-e-kehkasha ki roshni bhi

lubha na saki raahgir ko 

use to bas manzil ka hi Intezaar!

Ajeeb si kashmakash hai zindagi

sab kuch pa jane ke baad bhi

abhi talak hai to sirf Intezaar!

– by K->K>KImage